जमीन खरीदने की सोच रहे हैं तो इस तरह करें छानबीन
जमीन खरीदने की सोच रहे हैं तो इस तरह करें छानबीन
बने हुए घर की तुलना में प्लॉट खरीदने के लिए कई तरह की अतिरिक्त सावधानियां बरतनी पड़ती हैं। आज हम आपको बता रहे हैं कि डील फाइनल करते वक्त जमीन ग्राहकों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिेए।

Table of Contents
जमीन लेते वक्त शीर्षक की जांच जरूर करें:
सब-रजिस्ट्रार अॉफिस की तलाश:
जमीन खरीदने का पब्लिक नोटिस:
पावर अॉफ अटॉर्नी:
जमीन खरीद के ओरिजनल दस्तावेजों का वेरिफिकेशन:
जमीन खरीद के लिए मंजूरी और इजाजत:
जमीन खरीद में टैक्स और खाता:
जमीन खरीद के स्थानीय कानून:
जमीन की अवधि:
गिरवी जमीन:
जमीन का माप:
फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI):
जमीन लेते वक्त शीर्षक की जांच जरूर करें:
सब-रजिस्ट्रार अॉफिस की तलाश:
जमीन खरीदने का पब्लिक नोटिस:
पावर अॉफ अटॉर्नी:
जमीन खरीद के ओरिजनल दस्तावेजों का वेरिफिकेशन:
जमीन खरीद के लिए मंजूरी और इजाजत:
जमीन खरीद में टैक्स और खाता:
जमीन खरीद के स्थानीय कानून:
जमीन की अवधि:
गिरवी जमीन:
जमीन का माप:
फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI):
हर किसी का अपनी जिंदगी में प्रॉपर्टी लेने का सपना होता है। लेकिन फिर भी लोग खरीदने या निवेश के लिए जमीन को चुनते हैं। किसी भी रियल एस्टेट खरीद में जमीन अहम लागत वाला कंपोनेंट होता है और यह किसी भी तरह की प्रॉपर्टी से ज्यादा रिटर्न देती है। यह खरीददार को डिजाइन, लेआउट, फ्लोर प्लान इत्यादि का विकल्प देती है। लेकिन जमीन खरीदते वक्त अच्छी तरह जांच-पड़ताल जरूर कर लेनी चाहिेए।
जमीन लेते वक्त शीर्षक की जांच जरूर करें:
जमीन का टुकड़ा खरीदते वक्त शीर्षक की जांच करना सबसे अहम पहलू है। यह जरूर देखें कि शीर्षक (प्रॉपर्टी टाइटल) सही है या नहीं। इसका मतलब है कि जो शख्स प्रॉपर्टी बेच रहा है वो प्रॉपर्टी का असली मालिक है और उसके पास मालिकाना हक आपको देने का पूरा अधिकार है। टाइटल डॉक्युमेंट्स जैसे बिक्रीनामा, प्रॉपर्टी टैक्स रसीद की छानबीन और वेंडर का टाइटल कन्फर्म करने व सर्टिफिकेट पाने के लिए किसी वकील या एडवोकेट से मिलें। आम तौर पर जमीन दस्तावेजों की जटिलताओं और संपत्ति के अधिकारों का दावा करने में शामिल सीमाओं को ध्यान में रखते हुए पिछले 30 वर्षों के प्रॉपर्टी टाइटल का पता लगाने को कहा जाता है।
सब-रजिस्ट्रार ओफिस की तलाश:
यह खोज जमीन के लेनदेन और एन्कम्ब्रन्स को दर्शाता है। हर राज्य के सब-रजिस्ट्रार अॉफिस की अपनी अलग कार्यप्रणाली होती है। उदाहरण के तौर पर बेंगलुरु में सब-रजिस्ट्रार अॉफिस एन्कम्ब्रन्स सर्टिफिकेट जारी करते हैं, जबकि महाराष्ट्र के उप-रजिस्ट्रार कार्यालयों में मैन्युअल खोज करने में अनुभवी वकील या कोई शख्स रिपोर्ट जारी करता है। प्रॉपर्टी डील करने से पहले लीगल डॉक्युमेंट्स के लिए किसी शख्स को निर्धारित प्राधिकरण के पास जाना चाहिए।
जमीन खरीदने का पब्लिक नोटिस:
कोई भी प्रॉपर्टी खरीदने से पहले स्थानीय अखबारों में पब्लिक नोटिस देना अच्छा रहता है। (खासकर अंग्रेजी और स्थानीय अखबारों में) ताकि खरीदे जाने वाली जमीन पर कोई दावा ठोकना चाहे तो ठोक सकता है। इससे यह भी मालूम चल जाएगा कि जमीन पर किसी थर्ड पार्टी का अधिकार तो नहीं है।
पावर ओफ अटॉर्नी:
कई बार प्रॉपर्टी मालिक की ओर से किसी शख्स द्वारा पावर अॉफ अटॉर्नी (POA) के जरिए संपत्ति बेच दी जाती है। पीओए की बारीकी से जांच करनी चाहिए, ताकि मालूम चल जाए कि वही प्रॉपर्टी बेची जा रही है। कई बार एेसा भी टाइम आता है, जब कुछ समय के भीतर कई दस्तावेजों पर दस्तखत करना जरूरी होता है और देरी हो सकती है, जिसके खर्चा आपको उठाना पड़ सकता है। एेसी स्थितियों से निजात पाने के लिए आप अपनी जगह किसी और को साइन करने का अधिकार दे सकते हैं।
जमीन खरीद के ओरिजनल दस्तावेजों का वेरिफिकेशन:
बिक्री लेनदेन पूरी होने से पहले यह जरूरी है कि आप असली टाइटल डॉक्युमेंट देख लें। वह इसलिए ताकि मालूम चल सके कि विक्रेता ने थर्ड पार्टी राइट्स/चार्ज बनाकर उसे ओरिजनल के साथ विभाजित तो नहीं किया। बिक्री लेनदेन पूरी होने के बाद इन ओरिजनल दस्तावेजों को जरूर ले लेना चाहिए।
जमीन खरीद के लिए मंजूरी और इजाजत:
अगर बिक्री लेनदेन के हिस्से वाली संपत्ति/ भूमि पर पहले से इमारत बनी हुई है तो यह जांच कर लें कि अप्रूव्ड प्लान, मंजूरी और एनओसी हैं या नहीं। कुछ इमारतों पर लागू होने वाले हैरिटेज नियमों, और स़ड़क चौड़ी होने में देरी के बारे में भी सोचना चाहिेए।
जमीन खरीद में टैक्स और खाता:
जमीन खरीदने से पहले खरीददार को यह देख लेना चाहिए कि प्रॉपर्टी ट्रांसफर और ओरिजनल रसीदों की तारीख तक प्रॉपर्टी टैक्स जमा हो चुका है। साथ ही खाता (मालिक के नाम को दर्शाने वाली राजस्व रिकॉर्डिंग) भी वेंडर के नाम पर होना चाहिए।
जमीन खरीद के स्थानीय कानून:
खरीददार को यह मालूम कर लेना चाहिए कि जमीन खरीदने में स्थानीय कानूनों का कोई प्रतिबंध तो नहीं है। उदाहरण के तौर पर कर्नाटक में गैर किसान (जिसकी कृषि भूमि नहीं है) कंपनियां, फर्म्स और एेसे लोग, जिनकी इनकम 25 लाख से ज्यादा है, वह कृषि भूमि नहीं खरीद सकते। हालांकि एेसे ही प्रतिबंध कुछ अन्य राज्यों में भी हैं। इसलिेए जरूरी है कि जमीन खरीदने से पहले स्थानीय वकील से राय ली जाए।
जमीन की अवधि:
भूमि खरीदते वक्त यह भी देख लें कि वह कितनी पुरानी है। अगर जमीन लीज पर है, उसका कार्यकाल कम है या पुराने किराये पर ही उसको रिन्यू कराने का कोई प्रावधान नहीं है तो अतिरिक्त किराया जमीन खरीदने वाले को भुगतान करना होगा। इसकी भी संभावना हो सकती है कि प्रॉपर्टी को रिन्यू कराने का कोई क्लॉज हो ही नहीं।
गिरवी जमीन:
यह भी संभावना है कि विक्रेता ने जमीन को गिरवी रखकर बैंक से लोन लिया हो। खरीददार को यह जरूर देखना चाहिए कि विक्रेता ने जमीन का पूरा बकाया चुका दिया है। बैंक द्वारा एक रिलीज सर्टिफिकेट जारी किया जाता है, जिससे साबित होता है कि जमीन पर कोई बकाया नहीं है।
जमीन का माप:
अपने नाम पर जमीन कराने से पहले उसका माप जरूर ले लेना चाहिए। प्लॉट के बॉर्डर्स सही हैं, इसके लिए खरीददार को किसी नामी सर्वेयर की मदद लेनी चाहिेए। सटीकता कंपेयर करने के लिए सर्वे डिपार्टमेंट से जमीन का स्केच भी हासिल कर सकते हैं।
फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI):
FSI बताता है कि किसी जमीन पर कितनी कंस्ट्रक्शन करनी है। एफएसआई राज्य के शहर और कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट द्वारा निर्धारित किया जाता है। यह प्लॉट की लोकेशन पर भी निर्भर करता है। जमीन पर कितनी एफएसआई की इजाजत है, आप इसका पता विक्रेता या प्रॉपर्टी मालिक से लगा सकते हैं। साथ ही प्रोजेक्ट की वैधता और दस्तावेजों के सत्यापन के लिए किसी वकील को जरूर शामिल कर लें।
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